चुनौतियों और संघर्ष भरा रहा सुखराम का सफर - Him View
चुनौतियों और संघर्ष भरा रहा सुखराम का सफर
Him View 11-05-2022
पंडित सुखराम का देर रात को देहांत हो गया। उनका जन्म 27 जुलाई 1927 को भवदेव शर्मा के घर पर मंडी के कोटली में हुआ था। नगरपालिका के सचिव से शुरुआत की थी और केंद्रीय मंत्री की कुर्सी तक पहुंचे।
वह दिल्ली से कानून स्नातक थे व जिला न्यायालय मंडी में वकालत की। 1953 में नगर पालिका मंडी में सचिव पद पर नियुक्त हुए थे। 1962 में सदर हलके से निर्दलीय चुनाव लड़ा व विजयी हुए। 1967 में कांग्रेस के टिकट से चुनाव लड़ा। 1972 में सदर हलके से तीसरी बार विजयी हुए। 1977 में जनता पार्टी की लहर में अपनी सीट बचाने में कामयाब रहे। डाक्टर वाइएस परमार व रामलाल ठाकुर मंत्रिमंडल में पशुपालन, कृषि व लोक निर्माण मंत्री रहे।
1984 में पहली बार लोकसभा चुनाव लड़ा, राजीव गांधी सरकार में रक्षा उत्पादन एवं आपूर्ति, योजना, खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति राज्य मंत्री के रूप में भी कार्य किया। 1989 के लोकसभा चुनाव में भाजपा के महेश्वर सिंह से हार का सामना करना पड़ा। 1991 के लोकसभा चुनाव में विजयी हुए। पीवी नरसिम्हा राव सरकार में दूरसंचार राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) बने। 1996 में घर में सीबीआइ की दबिश पड़ी और करोड़ों की नकदी मिली। भ्रष्टाचार के आरोप लगने पर पार्टी से निष्कासित हुए और जेल भी जाना पड़ा।
जमानत मिलने के बाद हिमाचल विकास कांग्रेस का गठन किया। 1998 में भाजपा के साथ हाथ मिलाकर लोक निर्माण मंत्री बने। भ्रष्टाचार मामले में आरोप तय होने पर मंत्रीपद छोड़ना पड़ा। 2003 में कांग्रेस में वापसी की। इसके बाद 2009 में दूरसंचार घोटाले में तीन साल की सजा हुई।
2017 में भाजपा का दामन थामा और 2019 में फिर से कांग्रेस में वापसी कर ली।
पंडित सुखराम का राजनीति सफर चुनौतियों भरा रहा। उनके इस सफर में कई नाजुक दौर भी आए, लेकिन वह पहाड़ की तरह अड़िग खड़े रहे। हर चुनौती का डटकर सामना किया। विकासात्मक सोच के साथ-साथ वह कुशल एवं सख्त प्रशासक के रूप में जाने जाते थे। सदर हलके के तुंगल क्षेत्र के स्वतंत्रता सेनानी धनीराम ठाकुर के कहने पर पंडित सुखराम 1962 में राजनीति के क्षेत्र में अपनी किस्मत आजमाने उतरे थे। क्षेत्र की जनता का साथ मिला तो उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। डा. वाइएस परमार व रामलाल ठाकुर की सरकार में विभिन्न विभागों के मंत्री रहते हुए प्रदेश की जनता के दिलों में अमिट छाप छोड़ी।
मंडी सदर हलके की जनता कंधे से कंधा मिलाकर खड़ी रही तो प्रदेश की राजनीति में उनका कद भी बढ़ता गया। प्रादेशिक परिषद के बाद जब प्रदेश का पहला मुख्यमंत्री चुनने की बात आई तो पंडित सुखराम मंडी जिले के कद्दावर नेता ठाकुर कर्म सिंह के साथ खड़े होने के बजाय डा. वाइएस परमार के साथ खड़े हो गए। उन पर मंडी की जनता के साथ धोखा करने के आरोप लगे। मगर वह इससे विचलित नहीं हुए। वह प्रदेश की राजनीति को छोड़ केंद्र की राजनीति में नहीं जाना चाहते थे। मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचना उनका लक्ष्य था। रामलाल ठाकुर के बाद उन्हें प्रबल दावेदार माना जाता था, लेकिन 1983 में प्रदेश की राजनीति में दिल्ली से वीरभद्र सिंह की वापसी हुई तो उनकी डगर और मुश्किल भरी हो गई।

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